भारतीय 250 यहूदी पहुंचे इजरायल
तेल अवीव। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों, मणिपुर और मिजोरम में निवास करने वाले बीने मनेशे समुदाय के लगभग 250 सदस्य गुरुवार को इजराइल पहुंच गए हैं। यह कदम इजराइल सरकार द्वारा पिछले साल शुरू किए गए एक विशेष अभियान का हिस्सा है, जिसके तहत भारत में रह रहे इस समुदाय के लोगों को वापस उनके मूल देश में बसाने की योजना बनाई गई है। इजराइल सरकार ने अगले पांच वर्षों के भीतर हजारों यहूदियों के आव्रजन (इमिग्रेशन) के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने का वादा किया था, जिसकी पहली कड़ी के रूप में इस समूह का आगमन हुआ है।
इस महत्वपूर्ण पुनर्वास प्रक्रिया को ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन का नाम दिया गया है। वर्ष 2026 के दौरान इस ऑपरेशन के माध्यम से लगभग 1,200 और लोगों को इजराइल लाने का लक्ष्य रखा गया है। इजराइल के अलिया और इंटीग्रेशन मंत्रालय के अनुसार, आगामी दो सप्ताहों में दो और उड़ानों की व्यवस्था की गई है। इस पूरी पुनर्वास परियोजना के लिए इजराइल सरकार ने लगभग 9 करोड़ शेकेल (तीन करोड़ अमेरिकी डॉलर) का भारी-भरकम बजट आवंटित किया है, ताकि आने वाले नागरिकों को सुव्यवस्थित तरीके से बसाया जा सके।
बीने मनेशे समुदाय का इतिहास काफी दिलचस्प और चर्चाओं भरा रहा है। इस समुदाय का दावा है कि वे बाइबिल में वर्णित मनेशे कबीले के वंशज हैं, जो लगभग 2,700 साल पहले निर्वासित किए गए 10 कबीलों में से एक था। माना जाता है कि सदियों के विस्थापन के दौरान यह समुदाय फारस, अफगानिस्तान, तिब्बत और चीन होता हुआ भारत के पूर्वोत्तर हिस्से तक पहुंचा। लंबी अवधि तक अलग-थलग रहने और स्थानीय संस्कृतियों के प्रभाव के बावजूद, इस समुदाय ने खतना जैसी अपनी कुछ मौलिक यहूदी धार्मिक परंपराओं को जीवित रखा। हालांकि, इनके यहूदी होने को लेकर लंबे समय तक धार्मिक और वैधानिक बहस चलती रही। वर्ष 2005 में सेफारदी समुदाय के मुख्य रब्बी श्लोमो अमर ने अंततः उन्हें इजराइल के वंशज के रूप में मान्यता प्रदान की, जिससे उनके लिए इजराइल की नागरिकता का कानूनी रास्ता साफ हुआ। जानकारों का कहना है कि भारत में रहने के दौरान कई लोग ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए थे, इसलिए इजराइली कानून के तहत पूर्ण नागरिक बनने के लिए उन्हें औपचारिक धर्मांतरण प्रक्रिया से गुजरना होगा। पिछले तीन दशकों में इस समुदाय के करीब 4,000 सदस्य पहले ही इजराइल जा चुके हैं, जबकि 6,000 अन्य अभी भी अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। इजराइल का गठन ही दुनिया भर के यहूदियों को एक सुरक्षित छत प्रदान करने के उद्देश्य से हुआ था, और वर्तमान योजना इसी विचारधारा को मजबूती प्रदान करती है।

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